उपन्यास : विद्रोह
पृष्ठ संख्या : 176
मूल्य : 120 रुपये
कैलाश चंद चौहान उन उपन्यासकारों में हैं, जिन्होंने बहुत कम समय में उपन्यास लेखन में स्वयं को स्थापित किया है. जो लेखन को न केवल जीवन का पर्याय मानते हैं, बल्कि अपने आस-पास घटित होने वाली प्रत्येक घटना- परिघटना के प्रति सतर्क, जागरुक एवं चेतनाशील भी रहते हैं. वे इन्हें बड़ी ही सहजता से अपनी रचनाओं के कलेवर में पिरोना जानते हैं. उनके द्वारा रचित उपन्यास ‘विद्रोह’ इसकी जीवंत मिसाल है.
यह उपन्यास दो पीढ़ियों के मध्य उपजे साकारात्मक संघर्ष की प्रक्रिया और उसके परिणाम को दर्शाने में सफल रहा है. जिसे उपन्यास के नायक विक्रम के पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनैतिक घटनाक्रमों द्वारा समझा जा सकता है, जो एक पढ़ा-लिखा सुशिक्षित, सफल व्यक्ति होने के बावजूद भी अपने ही सहकर्मियों की जातीय निंदा और द्वेष का शिकार होता है.किन्तु इन सब से हताश निराश होने की बजाय वह और अधिक शक्ति एवं ऊर्जावान व्यक्तित्व के रूप में सामने आता है.
कैलाश जी द्वारा रचित उपन्यासों की यह विशेषता रही है कि उनके उपन्यासों की स्त्री पात्र अपने मुखर रूप में सामने आती हैं. ‘विद्रोह’ की असल पात्र तो स्त्रियां ही हैं, फिर चाहे वह अंतर्जातीय विवाह एवं प्रेम के लिए संघर्ष करती प्रियंका हो,ससुराल में अंधविश्वास के खिलाफ मुखर विरोध करती पूजा हो या जाति छुपाकर जीते कथित पढ़े-लिखे कहलाने वाले राघव के प्रेम को नकारने वाली स्वाभिमानी सुलेखा हो या अंजली. ये सभी पात्र अपने अपने किरदार में बहुत सटीक भूमिका में अवतरित होते हैं.
अतः ‘विद्रोह’ में स्त्री विमर्श खुलकर सामने आया है, अन्धविश्वास की शिकार ज्यादातर महिलाओं को दिखाया जाता है किन्तु यहां एक महिला ही उसका खुलकर विरोध करती है, कुल मिलाकर ये सभी पात्र उपन्यास को अधिक पठनीय और प्रासंगिक एवं रोचक बनाते हैं.
पृष्ठ संख्या : 176
मूल्य : 120 रुपये
कैलाश चंद चौहान उन उपन्यासकारों में हैं, जिन्होंने बहुत कम समय में उपन्यास लेखन में स्वयं को स्थापित किया है. जो लेखन को न केवल जीवन का पर्याय मानते हैं, बल्कि अपने आस-पास घटित होने वाली प्रत्येक घटना- परिघटना के प्रति सतर्क, जागरुक एवं चेतनाशील भी रहते हैं. वे इन्हें बड़ी ही सहजता से अपनी रचनाओं के कलेवर में पिरोना जानते हैं. उनके द्वारा रचित उपन्यास ‘विद्रोह’ इसकी जीवंत मिसाल है.
यह उपन्यास दो पीढ़ियों के मध्य उपजे साकारात्मक संघर्ष की प्रक्रिया और उसके परिणाम को दर्शाने में सफल रहा है. जिसे उपन्यास के नायक विक्रम के पारिवारिक, सामाजिक एवं राजनैतिक घटनाक्रमों द्वारा समझा जा सकता है, जो एक पढ़ा-लिखा सुशिक्षित, सफल व्यक्ति होने के बावजूद भी अपने ही सहकर्मियों की जातीय निंदा और द्वेष का शिकार होता है.किन्तु इन सब से हताश निराश होने की बजाय वह और अधिक शक्ति एवं ऊर्जावान व्यक्तित्व के रूप में सामने आता है.
कैलाश जी द्वारा रचित उपन्यासों की यह विशेषता रही है कि उनके उपन्यासों की स्त्री पात्र अपने मुखर रूप में सामने आती हैं. ‘विद्रोह’ की असल पात्र तो स्त्रियां ही हैं, फिर चाहे वह अंतर्जातीय विवाह एवं प्रेम के लिए संघर्ष करती प्रियंका हो,ससुराल में अंधविश्वास के खिलाफ मुखर विरोध करती पूजा हो या जाति छुपाकर जीते कथित पढ़े-लिखे कहलाने वाले राघव के प्रेम को नकारने वाली स्वाभिमानी सुलेखा हो या अंजली. ये सभी पात्र अपने अपने किरदार में बहुत सटीक भूमिका में अवतरित होते हैं.
अतः ‘विद्रोह’ में स्त्री विमर्श खुलकर सामने आया है, अन्धविश्वास की शिकार ज्यादातर महिलाओं को दिखाया जाता है किन्तु यहां एक महिला ही उसका खुलकर विरोध करती है, कुल मिलाकर ये सभी पात्र उपन्यास को अधिक पठनीय और प्रासंगिक एवं रोचक बनाते हैं.
डॉ. पूनम तुषामड़
यह उपन्यास यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं-

No comments:
Post a Comment